कद्दावर मुस्लिम नेता आजम खान की वह गलती जिसने बदला समाज का चेहरा…हजारों लोगों को मिली मदद

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मौलाना मोहम्मद अली जौहर UNIVERSITY
आज़म खां ने एक गलती की……! गलती सपना देखने की.. गलती सर सैय्याद और मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नक़्शे कदम पर चलने की….गलती अपने समुदाय के उत्थान के लिए एक बेहतरीन यूनिवर्सिटी की नींव रखने की!

मुलायम सिंह यादव की सरकार में आज़म साहब “मोहम्मद अली जौहर ऐक्ट, 2005” बिल पास कराने में सफल रहे। 2007 में संशोधन बिल लाया गया और यू. पी. विधानसभा एवं विधान परिषद में बामुश्क्कत पारित भी हो गया। बावजूद इसके राजभवन इस बिल के निकासी में बेवजह अड़चन डालता रहा।
मामला 2007 से खींचकर 2014 तक पहुंच गया, इस दौरान

टी. वी. राजेश्वर, बी.एल. जोशी जैसे गवर्नर आए और बड़ी बेरुखी के साथ इस बिल को किनारे लगा कर चल दिये।
संयोग से जून, 2014 में उत्तराखंड के तत्कालीन गवर्नर जनाब अजीज क़ुरैशी को यू.पी. का अतिरिक्त प्रभार दिया जाता है ! प्रभार संभालते ही वे बिस्मिल्लाह “जौहर यूनिवर्सिटी संशोधन बिल” को हरी झंडी दिखा कर करते हैं, और ठीक उसी दिन से उन्हें ऑफिस छोड़ने के लिए विवश किया जाना शुरू हो जाता है।

पर अब जो होना था हो चुका था, उस यूनिवर्सिटी की हर गुंबद सरकारी महकमे के अधिकारियों से लेकर संघी सरकार के प्रत्येक नुमाइंदे के सीने में चुभन पैदा करने लगी!

कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती है, अजीज़ क़ुरैशी को भले ही हफ्ते दिन के भीतर ऑफिस छोड़ना पड़ा हो पर आज़म खां ने अपना सत्र पूरा किया और पुनः भारी जीत के साथ लोकसभा में अपनी बुलंद आवाज़ और सोच लेकर हाज़िर हो गए।

समय-समय पर पर सदन उनपर अपनी भड़ास निकालता रहा। कभी देश-विरोधी बोलकर कभी महिला विरोधी बोलकर उन्हें कटघरे में खड़ा किया जाता रहा है, और आज अब्दुल्लाह आज़म को यूनिवर्सिटी से हिरासत में ले लिया गया है।

यह सिलसिला तबतक नहीं थमेगा जबतक संघियों के सीने में चुभ रहे जौहर यूनिवर्सिटी के उन गुम्बदों को उखाड़ ना फेंका जाए!

वजह साफ़ है कि वहाँ से पैदा होने वाले स्कालर इन्हें आजीवन कष्ट देते रहेंगे, अलग-अलग क्षेत्रों में, विभागों में इनके नज़र की किरकिरी बनते रहेंगे। जामिया, ए.एएम.यू ने पहले ही बहुत दर्द दिया है!

मैंने अक्सर लोगों को यह कहते सुना है कि मुस्लिमों की बदहाली का कारण उनके समुदाय में व्याप्त अशिक्षा और रूढिवादी सोच है, मुस्लिम अपने स्थिति के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार हैं…. वगैरह वगैरह!

होश सम्भालने के बाद से लेकर आजतक मैंने जितने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों का भ्रमण किया है, अशिक्षा और राजनैतिक अनभिज्ञता को इस समुदाय के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में देखा है। परंतु मैं इस बात से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखता की इन समस्याओं को मुस्लिम समुदाय ने स्वयं खड़ा किया है!

आंशिक जिम्मेदारी ज़रूर है, किंतु ज़्यादा करीब से देखने पर यह आभास हुआ कि सरकारी तंत्र का सौतेला रवैय्या ही हमारे पिछड़ेपन का कारण है। इस व्यवस्था ने हमें उतना ही दिया है जितना हम जबरन इनसे छीन पाए हैं।
अंत में कहना चाहूँगा कि मंगाना छोड़ के छीनने की प्रवृति अपने अंदर तीव्र कीजिए।

लड़ाई समझिए, वर्ना बारी बारी से सब धराशायी होंगे!इस एक विषय पर लेख लिख ही रहा हूँ कि मैंने फारूक अब्दुल्लाह के ऊपर कार्रवाई की खबरें पढ़ी। इस रफ़्तार की बाधा बनिए अन्यथा पश्चाताप के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा!
Via-shahreyar khan