तो इसलिए ट्रिपल तलाक बिल पास हो गया: सैय्यद आसिफ इमाम काकवी

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हमें तुम क़त्ल कर दो शौक़ से मंज़ूर है लेकिन
शरीयत के किसी मसले पे समझौता नहीं होगा.

राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत ना होने के बावजूद तीन तलाक बिल पास हो गया. ऊपरी सदन में सरकार को मिली इस कामयाबी से कमजोर विपक्ष की कलई खुल गई. लेकिन अब विपक्ष ने सरकार पर तीन तलाक बिल को धोखे से पास कराने का आरोप लगाया है.

बुधवार को राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने अन्य नेताओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की. उन्होंने आरोप लगाया कि बिल पेश होने के बारे में विपक्ष को नहीं पता था, लेकिन सरकार ने बिना सूचित किए बिल को पेश कर दिया, इसी वजह से हम अपने सांसदों को सूचना नहीं दे पाए. कल राज्यसभा में ट्रिपल त’लाक़ बिल पा’रित हो गया.

हालाँकि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार के पास ब’हुमत नहीं था लेकिन विपक्षी दलों में सूझ-बूझ की क’मी की वजह से ये हो पाया. कई पार्टियों के नेता एब्सेंट नज़र आये मैं विपक्ष की उन पार्टियों को दो’षी मानता हूँ जिन्होंने वाक आ’उट किया..इस समय भी, आप ग़ैर-हाज़िर हैं..फिर आपके सांसद होने की क्या ज़रूरत है.

उल्लेखनीय है कि बिल पर वोटिंग के समय तमाम सेकुलर पार्टियों ने हाथ खड़े कर लिए, मुसलमानों की पीठ में छुरा घोंपने वाले महबूबा मुफ्ती की PDP, चंद्रबाबू नायडू की TDP, नीतीश कुमार की JDU, मायावती की BSP तथा AIADMK ने राज्यसभा से किया बहिष्कार.कॉंग्रेस के चार, सपा के छह, एनसीपी के दो, आरजेडी के एक, सीपीआई के एक, टीएमसी के दो सांसद यानी कुल 20 सांसद तीन तलाक पर मतदान के वक्त रहे गैरहाजिर।

शरद पवार, प्रफुल पटेल, राम जेठमलानी भी नहीं थे राज्य सभा में हाजिर. चुनाव फिर आयेगा और फिर ये सेकुलर पार्टियां आपके पास आयेंगी और कहेंगी की मुझे वोट दो वरना बीजेपी जीत जाएगी। तब आप भी हाथ खड़े कर देना, और कहना हमें फर्क नहीं पड़ता। करीब चार घंटे की बहस के बाद राज्यसभा में तीन तलाक विधेयक पास हो गया। मु’स्लिम संस्थाएँ इस बिल का वि’रोध कर रही हैं.

इसका मुख्य कारण ये है कि इसमें एक सिविल लॉ को क्रि’मिनल लॉ के फॉर्म में ब’दला जा रहा है. हालाँकि भाजपा इसको महिला स’शक्ति’करण बता रही है. आपको बता दें कि कल क़ा’नून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मुस्लि’म महि’ला (विवाह अधिकार सं’रक्षण) विधेयक- 2019 राज्यसभा में पेश किया. प्रसाद ने इसे पेश करते हुए कहा कि तीन त’लाक नि’षेध विधे’यक मानवता, म’हिला सश’क्तिकरण और लैंगिक समानता सुनिश्चित करने वाला है.

भाजपा के नेतृत्व वाली NDA सरकार को पूरी उम्मीद थी कि राज्यसभा में भी ये बिल पा’रित हो जाएगा. परन्तु भाजपा की सहयोगी जदयू ने इस बिल का वि’रोध किया और वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया. ग़नीमत ये रही कि जदयू ने बिल के ख़ि’लाफ़ वोटिंग नहीं की. जदयू ने वाक-आउट करने का फ़ैसला किया.

वहीँ AIADMK ने भी सदन से वाक आउट करने का फ़ैसला किया. बीजू जनता दल ने कहा कि वो इस बिल का सम’र्थन करेगी. JDU और AIADMK के वॉकआ’उट से मोदी सरकार की राह आसान होती दिखी. वहीँ अंतिम समय में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ऑस्कर फर्नांडिस भी पहुँच गए. ऑस्कर फर्नांडिस के अंतिम समय में आने से इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कांग्रेस ने पूरी कोशिश की.

तीन तलाक बिल मंगलवार को राज्यसभा से पास हो गया। लेकिन, राज्यसभा में इसे पास कराने से पहले विपक्षी दल इसे सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने पर अड़े हुए थे। हालांकि, सेलेक्ट कमेटी के पास भेजे जाने का प्रस्ताव वोटिंग के बाद राज्यसभा में गिर गया। बिल को सेलेक्ट समिति में भेजने के पक्ष में सिर्फ़ 84 वोट पड़े और 100 इसके वि’रोध में पड़े.

इसका अर्थ ये हुआ कि बिल को जॉइंट सेलेक्ट समिति में नहीं भेजा जाएगा. राज्यसभा में विपक्ष के नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद ने सेलेक्ट समिति के प्रस्ताव के गि’रने के बाद कहा कि हम महि’ला सशक्तिकरण चाहते हैं और इसीलिए कुछ सुझाव हमने बताये थे लेकिन स’त्ता पक्ष ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया इसलिए हमें बिल के ख़िला’फ़ वोट करना पड़ेगा. बिल राज्यसभा में पा’रित हो गया, प’क्ष में 99 और विरो’ध में 84 वोट प’ड़े.

तीन तलाक बिल को काला कानून के रूप में जाना जाएगा। पिछली सरकार में लोकसभा में पारित होने के बाद विधेयक राज्यसभा में लंबित हो गया था. राज्यसभा में सरकार का बहुमत न होने के कारण इसे पास नहीं कराया जा सका था लेकिन, इस बार कुछ दलों के वॉकआउट करने की वजह से सरकार मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2019 को आसानी से पारित करवाने में सफल हो गई.

दोनों सदनों से पारित होने के बाद अब इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए भेजा जाएगा जिसके बाद ये क़ानून बन जाएगा.तीन तलाक़ विधेयक अपनी शुरुआत से ही विवादित रहा है. विपक्ष से लेकर कई सामाजिक संगठन इसका विरोध करते रहे हैं. इसे आपराधिक क़ानून बनाने और पति को सज़ा के प्रावधान को लेकर ख़ासतौर पर आपत्ति जताई गई है.

आइये बताते हैं इस बिल की खास बातें- ये क़ानून शौहर को तीन साल के लिए जेल भेजने की बात कहता है. इस तरह तीन साल तक आपने बीवी को सड़क पर खड़ा कर दिया. उनके रहन-सहन का इंतज़ाम कौन करेगा? ये विधेयक महिलाओं के हक़ में बिल्कुल नहीं है.दूसरी बात ये है कि दस्तूर में जो तलाक़ का हक़ दिया गया है उसके ख़िलाफ़ भी ये क़ानून है.

इसलिए हम कहते हैं कि ये ज़ुल्म का क़ानून है.शौहर को सज़ा की बात करें तो इस बिल के मुताबिक़ कोई अगर तीन तलाक़ बोल भी दे तो वो तलाक़ नहीं माना जाएगा. जब तलाक़ ही नहीं हुआ तो शौहर को सज़ा क्यों दे रहे हैं? मुस्लिम महिलाएं तो 60 फ़ीसदी ऐसे ही ग़रीबी रेखा वाली ज़िंदगी गुज़ारती हैं और अगर तीन साल के लिए उसका शौहर जेल जाएगा तो उसका क्या होगा?

कब दर्ज होगा केस : – यह अपराध संज्ञेय (इसमें पुलिस सीधे गिरफ्तार कर सकती है) तभी होगा, जब महिला खुद शिकायत करेगी।
– खून या शादी के रिश्ते वा

ले सदस्यों के पास भी केस दर्ज करने का अधिकार रहेगा।
– पड़ोसी या कोई अनजान शख्स इस मामले में केस दर्ज नहीं कर सकता है।
समझौते की शर्त :
– कानून में समझौते के विकल्प को भी रखा गया है।
– पत्नी की पहल पर ही समझौता हो सकता है, लेकिन मजिस्ट्रेट के द्वारा उचित शर्तों के साथ।
जमानत के नियम :
– मजिस्ट्रेट इसमें जमानत दे सकता है, लेकिन पत्नी का पक्ष सुनने के बाद।
गुजारे के लिए प्रावधान :
-तीन तलाक पर कानून में छोटे बच्चों की कस्टडी मां को दिए जाने का प्रावधान है।
– पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण का अधिकार मजिस्ट्रेट तय करेंगे, जिसे पति को देना होगा।
डेढ़ साल में तीन तलाक के 430 मामले :
– 2017 के जनवरी से 2018 के 13 सितंबर तक 430 घटनाएं सामने आईं
– 229 इनमें से सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले के हैं
– 201 सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद के हैं।
सर्वाधिक मामले यूपी में :
– 126 केस सामने आए यूपी जनवरी 2017 से पहले
-120 केस सामने आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद।

प्रधानमंत्री का कहना है कि इतिहासिक फैसला है।यदि ऐसा होता तो सभी मुसलमान के लिए गर्व की बात होती क्योंकि सभी महिलाएं सभी पुरूषों की कोई न कोई बेटी, बहन ही है। फिर पुरूष खुश क्यों नहीं होते जब उनकी बेटियों और बहनों की भविष्य सुरक्षित हो जाती।

ये बिल बहुमत के द्वारा आपातकाल की तरह जबरदस्ती थोपी गई है। हम कह सकते हैं कि Bjp ने ताकत के बल पर शरियत पर आक्रमण किया है।जब देश की बहुसंख्यक मुस्लिम महिलाओं ने इस बिल का विरोध किया है जिसके लिये इसे वरदान कहा जा रहा तो इसका औचित्य कहां है?देश की एक भी मुस्लिम महिला इस बिल के पक्ष में नहीं है।

बिल इस पर आना चाहिए जहाँ महिलाओं को नियोग के लिए विवश किया जाता है, जहां महिलाओं को देवदासी बना दिया जाता है, जहां महिलाओं को बिना तलाक के छोड़ दिया जाता है। देश में ऐसी 13 करोड़ महिलाएं नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त है। जब सरकार ख़ुद कहती है कि पूरे देश में तीन तलाक़ के 200 मामले आए तो मतलब है कि सामाजिक सुधार का काम हो रहा है.

सरकार इंतज़ार तो करे, सामाजिक सुधार का काम चंद दिनों में नहीं होता है. फिर सरकार ने ख़ुद इसके लिए क्या किया. क्या कभी विज्ञापनों और संदेशों के ज़रिए इस पर रोक की अपील की? मुझे लगता है कि ये पूरी तरह राजनीतिक मामला है, न कि मुसलमान महिलाओं के भले के लिए ये किया गया है.

इसमें विपक्ष ने भी अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभाई. कुछ राजनीतिक दलों ने राज्यसभा से वॉक आउट करके सरकार का समर्थन ही किया।तीन तलाक बिल से मुसलमानों का कोई लेना देना नहीं है, जो लोग मुसलमान हैं वे कुरान और हदीस को मानते हैं. वह जानते हैं कि तलाक का पूरा प्रोसीजर कुरान में दिया हुआ है।

ऐसे में हमारे लिए कुरान के उस प्रोसीजर के अलावा कोई भी कानून मान्य नहीं है। हमारे मुल्क हिंदुस्तान में हर एक को अपने मज़हब के हिसाब से जीने का हक़ दिया गया है।‘ लेकिन मौजूदा सरकार का कहना है कि *इस्लाम औरतों पर ज़ुल्म करता है।

‘ नअज़ूबिल्लाह और इस झूठ की आड़ में सरकार *कॉमन सिविल कोड या समान नागरिक संहिता* नाम का एक काला क़ानून लागू करना चाहती है।‘ जिस से हमारे मज़हबी क़ानून खत्म हो जाएंगे और *हमारी शादियां तलाक़ और जायदाद में हिस्सेदारी जैसे पर्सनल मसले क़ुरआन और हदीस के बजाए दूसरे मज़हब के हिसाब से तय किए जाएंगे।

इस्लामी शरीअत औरतों की सुरक्षा करने वाली है। यह शरीअत कयामत तक कायम रहेगी। तीन तलाक को लेकर जो बिल आया है वह हमें मजूंर नहीं है।

सैय्यद आसिफ इमाम काकवी