यहा मक्कार राजनेता, सियासी दलाल, रिश्वतखोर अफसर और शातिर सटोरिए अरबों-खरबों में खेलते हैं: पूर्व IPS धुव्र

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बाते हैं, बातों का क्या !

धुव्र गुप्ता ( पूर्व आईपीएस)

यह अपना ही देश है जहां शराब, सौंदर्य प्रसाधन, जहरीले कोल्ड ड्रिंक्स, विलासिता की चीज़ें बनाने वाले लोग, कुछ मुनाफ़े के लिए ज़मीर बेचने वाले कॉर्पोरेट घराने, देह प्रदर्शन करने वाली स्त्रियां और इनका इस्तेमाल करने वाले अश्लील फिल्मों के निर्माता, मक्कार राजनेता, सियासी दलाल, रिश्वतखोर अफसर और शातिर सटोरिए अरबों-खरबों में खेलते हैं और देश का अन्नदाता किसान भूख, अभाव और क़र्ज़ के बोझ तले आत्महत्या करता है।

यह अपना ही देश है जहां जुमलेबाज राजनेताओं, परजीवी मुल्लों-साधुओं और ग्लैमर की दुनिया के मूर्ख लोगों की शर्मनाक हरकतें और बेहूदे भाषण ख़बरों की सुर्खियां बनते हैं और किसानों का हाहाकार अखबारों के किसी कोने में सिसक कर दम तोड़ देता है। यह अपना ही देश है जहां क्रिकेट की एक-एक गेंद पर अरबों का सट्टा लगता है और दाम के अभाव में किसान अपने आलू-टमाटर सड़कों पर फेंकने को मजबूर हैं ! यह अपना ही देश है जहां अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतों की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए देश के किसान एक अरसे से फ़रियाद करते रहे हैं और देश की संवेदनहीन सत्ता के कानों में उनकी आवाज़ तक नहीं पहुंचती।

किसानों ने दिल्ली को अपना दर्द और अपनी ताक़त दिखा जरूर दी है, मगर उनको भी शायद पता होगा कि देश की संवेदनहीन सरकार बातों के सिवा उन्हें कुछ नहीं देने वाली। इस सरकार ने वैसे भी अपने पिछले चुनाव घोषणा-पत्र में किसानों, बेरोजगारों,और महंगाई की मार झेलने वाले आम लोगों से अपने चुनाव घोषणा-पत्र में किए किसी भी वादे को पूरा नहीं किया है। बेमन से किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की जो घोषणा की गई, वह जमीन पर कहीं नहीं उतरी।

फसल बीमा योजना का लाभ सिर्फ बीमा कंपनियों को हुआ है। वैसे भी किसान, मजदूर और बेरोजगार इस सरकार के लिए कोई मसला नहीं। उसे भरोसा है कि वह कुछ भी नहीं करेगी तब भी राम मंदिर, हिन्दू-मुसलमान, गाय-गोबर के नाम पर उत्तेजना फैलाकर देश के तीस-चालीस प्रतिशत मूर्ख या भोले मतदाताओं के वोट हासिल कर सरकार बना ही लेगी। इस सरकार को छोड़िए, अभी किसानों के लिए घड़ियाली आंसूं बहाते तमाम विपक्षी दलों को देखकर भी क्या आपको गुस्सा नहीं आता ?

पूछा जाना चाहिए कि कांग्रेस को अपने लंबे शासन काल में किसानों को उनके श्रम का उचित मूल्य देने और उनकी दशा सुधारने की चिंता क्यों नहीं हुई ? हताश किसान उसके शासनकाल में भी मरते और आत्महत्या करते रहे हैं। किसानों के समर्थन में किसी भी मार्च में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों के शासनकाल में क्या बंगाल, केरल और त्रिपुरा के किसानों की तमाम समस्याएं हल की जा चुकी है ? या फिर किसानों के हित में अपने चुनाव घोषणा-पत्रों में लंबे-चौड़े वादे काने वाले दर्जनों क्षेत्रीय दलों के शासनकाल में हमारे किसान कितने खुशहाल हुए ?

ये तमाम दल वादें चाहे कितने लुभावने कर लें, सत्ता प्राप्त करने के बाद इनकी प्राथमिकताएं बदलती रही हैं। आम आदमी की समस्याओं के प्रति सभी एक जैसे ही उदासीन रहे हैं। इन्हें औकात में लाने का उपाय यह है कि सियासी दलों के चुनाव घोषणा-पत्रों को बाध्यकारी वैधानिक दस्तावेज़ घोषित कर दिया जाय। जो दल सरकार बनाने के बाद अपने कार्यकाल में मतदाताओं से किए अपने वादें पूरे नहीं करे, अगले चुनाव के पहले उसकी मान्यता ही समाप्त कर दी जाय। देश में सच्चा लोकतंत्र तभी आएगा। जब तक यह नहीं होगा, राजनीतिक दल हमें छलते रहेंगे और हम देश के लोग इनकी झूठी बातों में आकर बार-बार मूर्ख बनते रहेंगे।