ऐसे 2019 में मोदी सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है ये लाखों की भीड़

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सरकार बनाने और बिगाड़ने का खेल खेल सकता है किसान

राजधानी दिल्ली में 30 नवंबर को देश के चौबीस राज्यों और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों से आए लाखों किसानों का हुजूम उमड़ा, शांतिपूर्ण तरीके से हुए इस किसान मुक्ति मार्च/संसद के पीछे दो ठोस वजहें थीं. पहली, किसानों की दुर्दशा को सामने लाना, ताकि उचित कानून बनाने की मांग को समर्थन मिले और दूसरी विगत दो अक्तूबर को हुए आंदोलन के दौरान किसानों पर हुए लाठीचार्ज के जरिये पैदा डर का दूर होना।

अपने 25 वर्षों के अनुभव के आधार पर मुझे पता है कि रेल और सड़क मार्ग जाम करना, गाड़ियां जलाना आंदोलन का बेहतर स्वरूप नहीं है. इस आंदोलन का आह्वान ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी (एआईकेएससीसी) ने किया था, जिसका गठन पिछले वर्ष जून में पुलिस फायरिंग में छह किसानों की मौत के बाद किया गया था।

हमारे संगठन, राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में पीआईएल दाखिल करके कानूनी रास्ता अपनाया, जिससे अनेक किसानों को करोड़ों रुपये की राहत मिली. एआईकेएससीसी ने कृषि संकट को दूर करने के लिए दो फौरी मांगें की हैं, पहला है किसानों की कर्ज माफी और दूसरा है गारंटीशुदा लाभकारी एमएसपी।

इस आंदोलन में किसानों की जो मुख्य मांगें हैं, वे कमोबेश बिल्कुल वही हैं, जिनका वायदा प्राधनमंत्री ने 2014 के चुनाव अभियान में किया था एआईकेएससीसी ने दो केंद्रीय कानूनों के अधिनियमन के माध्यम से अपनी मांगें पूरी कराने का फैसला लिया है, जिसके लिए शुरुआती ड्राफ्ट नवंबर, 2017 में नई दिल्ली के संसद मार्ग पर किसान मुक्ति संसद में पेश किए गए थे।

मार्च, 2018 में दिल्ली में हुई एक बैठक में इक्कीस राजनीतिक दलों ने सर्वसम्मति से किसानों के हक में तैयार किए गए अंतिम मसौदे पर अपने दस्तखत किए थे। इन बिलों को तीन महीने पहले संसद में रखा गया. पहले बिल में किसानों के ऋण मोचन संबंधी प्रावधानों का जिक्र किया गया और स्वामीनाथन रिपोर्ट की सिफारिशों के हवाले से मांग की गई कि जिस तरह सरकारी कर्मचारियों को वेतन आयोग की ओर से तमाम तरह के भत्ते एरियर स्वरूप पुरानी तारीख से दिए जाते हैं, किसानों को ऐसी सुविधा क्यों नहीं मिलती। बिल का मकसद कर्ज से आजादी है, न कि कर्ज से छूट।

दूसरे बिल में न्यूनतम समर्थन मूल्य को धरातल पर उतारने की बात है। डीजल, खाद, बिजली या कीटनाशकों की ही तरह किसी को भी एमएसपी से कम पर उत्पाद खरीदने पर सख्त सजा के प्रावधान किए जाएं! साथ ही एमएसपी गणना के लिए स्वामीनाथन रिपोर्ट की सिफारिशों का पालन किया जाए।

संसद से निराशा हाथ लगने के बाद एआईकेएससीसी ने राष्ट्रपति से मुलाकात की और किसानों के मुद्दे पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की. जब वहां से भी कुछ हासिल नहीं हुआ, तो एआईकेएससीसी को 29 नवंबर को दिल्ली में किसान मुक्ति मार्च के लिए मजबूर होना पड़ा, ताकि सरकार पर दबाव बनाया जा सके। यदि जीएसटी बिल पास कराने के लिए आधी रात को संसद सत्र बुलाया जा सकता है, तो किसानों के लिए क्यों नहीं?

वक्त आ गया है कि देश किसानों के हक में आगे आए। पी साईंनाथ ने ‘नेशन फॉर फारमर्स’ नाम से एक समूह बनाया है, जिसमें कई क्षेत्रों के लोग शामिल हैं. कई अन्य लोग भी ऐसा कर रहे हैं। एनडीए के घटक दलों ने भी किसानों की पीड़ा समझी है, पर मैं हैरान हूं कि प्रधानमंत्री अपने वायदे से इस कदर अनजान क्यों बने हुए हैं. एआईकेएससीसी का किसानों से कहना है कि चुनावी मौसम में आराम के बजाय कड़ी मेहनत करें, ताकि कृषि को पुनर्जीवित करने का मिशन पूरा हो सके।

लेखक ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी के संयोजक हैं।